विवश शब्द को ऋण कर दो!

पत्थरों का प्राण कहता,
युग भी निर्माण कहता|
कपकपाते होंठ कहतें,
पोंछ दो आंसू जो बहतें|

जीर्ण-जीर्ण को तृण कर दो,
विवश शब्द को ऋण कर दो|
आगमन में दसों दिशाएँ,
देख तुमको मुस्कुराएँ|
फिर बसंती वात बहती,
कूक कोयल क्या न कहती?
समझने की फेर कैसी?
समझ लो तो देर कैसी?
बंधनों पर प्रहार कर दो,
हर दिवस त्योहार कर दो|

अम्बर का आनन् न सूना,
अभी तुम्हें अम्बर है छूना|
ओज का तू दर्श कर ले,
दर्द का स्पर्श कर ले|
आस्था की मूर्तियों में,
तू मूर्तियों की आस्था है|
तू नहीं कुछ जानता है,
तू क्यूँ ऐसा मानता है?

यायावरी

Categories: For Navodayans, Hindi Poems, Yaayaawar | 1 Comment

Post navigation

One thought on “विवश शब्द को ऋण कर दो!

  1. कविता पढ़कर ऐसा लग रहा है जैसे एक यायावर एक भटके राही को राह दिखाने का पर्यत्न कर रहा है. ठीक वैसे ही जैसे असीम सागर करता है भूले नाविक का आह्वान।

    rgds.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Create a free website or blog at WordPress.com.

%d bloggers like this: