Hindi Poems

कोरोना: एक भय!

अश्क़ है ये,
आपसे फरमाता है।
श्रमिक-बंधुओं की ,
देख, दुर्दशा पछताता है।।

द्वंद है, या विष?
मन सोच सोच अकुलाता है।
लाकॅडाउन, के विस्तृत रूप मात्र से,
ही मन विचलित हो जाता है।।

समाधान यही है बस,
इसलिए, हर पग पथ पर बढ़ता जाता है।
कोरोना के बढ़ते कहर देख,
हर साँस भी भयभीत हो जाता है।।

संपूर्ण विश्व नतमस्तक पड़ा है,
भारत शान्तिदूत बन खड़ा हैं।
उनकी अपेक्षाओं स्वरूप,
स्वंय पीङित हो,
अपना हाथ बढ़ाता है।।

“प्रेरणा”

JNV Kolasi Katihar

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घृणित हिंसा-कोरोना!

कोरोना को हथियार बना कर ,
चीन ने ये जंग छेङी है ।
द्वितीय विश्व युद्ध से भी बङा,
जनमानस को जलती दाह मे ढकेली है।

भारत अपनी राह पे निरंतर,
दृढ़-संयम से डट कर खङी है।
हर एक कतरा सिर पर उठा कर,
पग-पग पर खुद से लङ रही है।

किसने तुमको हक दिया ये,
इस महामारी को फैलाने को ।
ऋणी हो तुम इस मातृभूमि के,
और सहयोग दिया तुमने,
औरौ के जंग को फैलाने को।

आखिर, किस हद तक पङे हो तुम,
इस हिंसा को फैलाने को ।।

——–प्रेरणा —–‐—-

JNV Kolasi Katihar, Bihar

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फ़ैसले की घड़ी!

WhatsApp Image 2020-04-08 at 12.12.01 AMफूंक दी ख़ुद की हस्ती को,
सब ओर अंधेरा कर डाला,
सबकुछ पाने की लालच में,
ख़ुद को ही मैला कर डाला;

कभी ये मांगा, कभी वो चाहा,
कभी छीन लिया कुछ अनचाहा,
सपने, हसरत, इक्छाओं के,
जंजाल में ख़ुद को यूं बांधा;

अंत तक निचोड़ लिया,
हर अंग को मरोड़ दिया,
अनगिनत लिप्साओं के लिए,
धरती का सीना कोड़ दिया;

धरती मां के सीने में हमने,
कितने खंजर घोंप दिए,
फ़िर अपने सारे पापों को,
उनके आंचल में पोंछ दिए;

वो चीखी भी, चिल्लाई भी,
पर एक ना उनकी चलने दी,
अपने तमस की चिंगारी में,
सारी धरती यूं जलने दी;

वो ममतामयी भी क्या करती,
हर जुल्म हमारे सहती रही,
पापों का कब घड़ा भरे,
इस आस में चुप सी बैठी रही;

लो आज घड़ा भर आया है,
अब पाप चरम पर छाया है,
धरती मां के आंखों में अब,
एक ख़ून उतर सा आया है;

अब धरती ने हुंकारा है,
जाने कैसा ये नज़ारा है,
कहीं आगजनी, कहीं तूफ़ा है,
कहीं बाढ़ तो, कहीं पे सूखा है;

मानव मानव को लील रहा,
ये कैसी प्रलय की घटना है,
हर वक़्त यही सब सोच रहे,
कब, कैसे, मुझको बचना है;

मातम बिखरा हर ओर यहां,
भारी विपदा घिर आई है,
सन्नाटा हर पल चीख रहा,
अब मानवता थर्राई है;

हम जितना चाहे भाग लें अब,
चाहे ख़ुद को कितना बांध लें अब,
पैरों से धरती खींचेगी,
फ़िर ख़ुद में सबको भींचेगी।।

श्वेता सिंह
JNV Katihar.
(०७/०४/२०२०)

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For Mukta Di…

(Ek chhoti si kosis di ke antim aehsas ko or unke jajbat ko likhne ki)

Mai jinda rhungi tb tk
Jb tk hai meri kahaniya
Ab tk sans le rahi hai
Mujhse juri hr nisaniye

Mai moun Ho gai to kya
Mere hr alfaz jinda hai
Mere aankho me jo kaid hokr reh gai
Wo khawab jinda hai
Meri dhadkano ki hr dhimi hoti gai chikh me
Meri mohbat ka aehsas jinda hai

Meri bachpan ki saitaniyo me ji rahi hu main
Maa ke loriyo or kahaniyo me ji rahi hu main
Papa ke sng ki mnmaniyo me ji rahi hu main
Hr aurat ki kurbaniyo me ji rahi hu mai

Mai jinda rhungi tb tk
Jb tk hai meri kahaniya
Ab tk sans le rahi hai
Mujhse juri hr nisaniye
By(Avantika Pallavi, JNV Katihar)

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Haar Nahi Manungi…. RIP MUKTA!

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दिल का तहखाना !

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पुष्ट ठोस लौह खण्ड था!

पुष्ट ठोस लौह खण्ड था
तेरी नर्म धूप से पिघल चुका हूं मै।
शुष्क सलेटी अलक्षित वर्ण से
कुंडल पीत रंग में बदल चुका हूं मैं।
स्मारक के ऊंचे सख्त पाट पे
शाम ,नर्म गोद मे सो चुका हूं मैं।
तेरी ख्वाहिशों की श्रंखलाओं में
श्लथ, परास्त जकड़ चुका हूं मैं।
नम नयन सहज स्खलित अश्रु में
नमक की तरह गल चुका हूं मैं।
तुझसे तिरस्कृत, परित्यक्त, ज़िंदा,पर
सजीव लाश में ढल चुका हूं मैं।
इतना जल चुका हूं कि
अब कोयला ही बचा हूँ मैं।

Regards,

Ranvijay, JNV Faizabad, UP

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एक कतरा चाँद का!

एक कतरा चाँद का था, एक फाहा बादलों का
खोल गुड़िया की पिटारी, फिर नए सपने चुने
सरदी की सांझें गुलाबी, जेठ की कुछ दोपहर से
जलते बुझते, खट्टे मीठे, फिर नए रिश्ते बुने

कुछ छलकती आँखों वाली, कुछ हँसी की बातों की
जोड़ शब्दों के सिरे, फिर लिखी कोई कहानी
लेन देन, झुठे सच्चे की, कहीं निभायी दुनियादारी
कहीं बंधन तोड़ सारे, बाँधा एक रिश्ता रूहानी

यूं ही रूकते, चलते, थकते, नापी दूरी इस जगत की
हाथ छुटे, साथ छुटे, कुछ रहे साथी सफर के
कहीं पलकें भींगी दो पल, कहीं रो कर रात काटी
कहीं मुस्कानों, खुशी में, बीते ये पहिये पहर के

हर कहीं से थोड़ा थोड़ा, ढेर सारा स्नेह जोड़ा
ना गिला शिकवा किसी से, सबने कुछ ना कुछ सिखाया
वक्त के पहिये रूके कब, छांव धूप दोनों पाई
दुख ने जो दस्तक कभी दी, सुख भी तो बेबाक आया!

By Shweta Sharma. JNV Jojawar

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Tab Chuppi Todo…

Dear All,

I am posting a poem which is written by one of my loving junior Shweta from JNV Katihar, Bihar. The title of her poem “Chuppi Todo” encourages women to raise your voice against the violence.

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मैंने भी यहाँ ज़िन्दगी के सबसे हशीन लम्हों को बिताया है!

Although it’s copied from somewhere but I find it worth so I am posting it here. I don’t remember from where I copied it.

मैंने भी यहाँ ज़िन्दगी के सबसे हशीन लम्हों को बिताया है,

मैंने भी यहाँ की मेस के ट्रकों को पलटाया है,

मैंने भी यहाँ इंग्लिश में जी भर के मार खाई है,

कभी यहाँ मैंने, भी गणित में डांट पायी है,

मार खा के यहाँ मेरे भी कभी पड़े छाले थे,

मैंने भी कभी यहाँ यूनिट टेस्टों में अंडे उबाले थे,

मैंने भी कभी बैठकर खिल्लियाँ उड़ाई थीं,

सीनियरों के हाथों से मैंने भी मार खाई थी,

कभी कभी मैंने भी जूनियर्स को सताया था,

हॉउस मास्टर के हाथों से उसका परिणाम भी पाया था,

दीवारें मेरे लिए भी कभी इतनी ऊंची नहीं थी,

की मेरी छलांग उनके पार पहुची नहीं थी,

मैंने भी पीछे के खेतों की फसलों को भारी नुकसान पहुचाया था,

मैंने भी सीताफलों का कभी भरपूर आनंद उठाया था,

बेर हों, चने हों, या मटर, मैंने सब को वहां खूब पाया,

टीचर्स के केले हों या प्रिंसिपल का अमरुद, मैंने जी भर के खाया।

मगर फिर भी सच कहूं, ये जगह मुझे अपने घर से आज भी प्यारी है,

जहाँ मैंने दुःख सुख, से भरी अपनी सबसे हशीन ज़िन्दगी गुज़ारी है।

मैंने भी यहाँ ज़िन्दगी के सबसे हशीन लम्हों को बिताया है!

JNV Latehar, Jharkhand.

JNV Latehar, Jharkhand.

 

Thanks,
Prabhat Kumar Ravi
JNV Latehar, Jharkhand.

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