Prerna

कोरोना: एक भय!

अश्क़ है ये,
आपसे फरमाता है।
श्रमिक-बंधुओं की ,
देख, दुर्दशा पछताता है।।

द्वंद है, या विष?
मन सोच सोच अकुलाता है।
लाकॅडाउन, के विस्तृत रूप मात्र से,
ही मन विचलित हो जाता है।।

समाधान यही है बस,
इसलिए, हर पग पथ पर बढ़ता जाता है।
कोरोना के बढ़ते कहर देख,
हर साँस भी भयभीत हो जाता है।।

संपूर्ण विश्व नतमस्तक पड़ा है,
भारत शान्तिदूत बन खड़ा हैं।
उनकी अपेक्षाओं स्वरूप,
स्वंय पीङित हो,
अपना हाथ बढ़ाता है।।

“प्रेरणा”

JNV Kolasi Katihar

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