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घृणित हिंसा-कोरोना!

कोरोना को हथियार बना कर ,
चीन ने ये जंग छेङी है ।
द्वितीय विश्व युद्ध से भी बङा,
जनमानस को जलती दाह मे ढकेली है।

भारत अपनी राह पे निरंतर,
दृढ़-संयम से डट कर खङी है।
हर एक कतरा सिर पर उठा कर,
पग-पग पर खुद से लङ रही है।

किसने तुमको हक दिया ये,
इस महामारी को फैलाने को ।
ऋणी हो तुम इस मातृभूमि के,
और सहयोग दिया तुमने,
औरौ के जंग को फैलाने को।

आखिर, किस हद तक पङे हो तुम,
इस हिंसा को फैलाने को ।।

——–प्रेरणा —–‐—-

JNV Kolasi Katihar, Bihar

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फ़ैसले की घड़ी!

WhatsApp Image 2020-04-08 at 12.12.01 AMफूंक दी ख़ुद की हस्ती को,
सब ओर अंधेरा कर डाला,
सबकुछ पाने की लालच में,
ख़ुद को ही मैला कर डाला;

कभी ये मांगा, कभी वो चाहा,
कभी छीन लिया कुछ अनचाहा,
सपने, हसरत, इक्छाओं के,
जंजाल में ख़ुद को यूं बांधा;

अंत तक निचोड़ लिया,
हर अंग को मरोड़ दिया,
अनगिनत लिप्साओं के लिए,
धरती का सीना कोड़ दिया;

धरती मां के सीने में हमने,
कितने खंजर घोंप दिए,
फ़िर अपने सारे पापों को,
उनके आंचल में पोंछ दिए;

वो चीखी भी, चिल्लाई भी,
पर एक ना उनकी चलने दी,
अपने तमस की चिंगारी में,
सारी धरती यूं जलने दी;

वो ममतामयी भी क्या करती,
हर जुल्म हमारे सहती रही,
पापों का कब घड़ा भरे,
इस आस में चुप सी बैठी रही;

लो आज घड़ा भर आया है,
अब पाप चरम पर छाया है,
धरती मां के आंखों में अब,
एक ख़ून उतर सा आया है;

अब धरती ने हुंकारा है,
जाने कैसा ये नज़ारा है,
कहीं आगजनी, कहीं तूफ़ा है,
कहीं बाढ़ तो, कहीं पे सूखा है;

मानव मानव को लील रहा,
ये कैसी प्रलय की घटना है,
हर वक़्त यही सब सोच रहे,
कब, कैसे, मुझको बचना है;

मातम बिखरा हर ओर यहां,
भारी विपदा घिर आई है,
सन्नाटा हर पल चीख रहा,
अब मानवता थर्राई है;

हम जितना चाहे भाग लें अब,
चाहे ख़ुद को कितना बांध लें अब,
पैरों से धरती खींचेगी,
फ़िर ख़ुद में सबको भींचेगी।।

श्वेता सिंह
JNV Katihar.
(०७/०४/२०२०)

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